Franchise vs Dealership in Hindi | Step by step guide
बिजनेस की दुनिया में कदम रखते ही सबसे पहले दो शब्द सुनने को मिलते हैं – Franchise vs Dealership (डीलरशिप)। ऊपर से देखने पर ये दोनों मॉडल एक जैसे लगते हैं। दोनों में आप किसी और कंपनी का सामान बेचते हैं, दोनों में आप एक established ब्रांड का नाम यूज करते हैं, और दोनों में पैसा कमाने का मौका होता है। लेकिन अगर आप ground level प देखेंगे, तो इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।
अक्सर नए लोग बिना पूरी रिसर्च किए किसी भी मॉडल में पैसा लगा देते हैं। “फलानी कंपनी की डीलरशिप मिल रही है” या “उस बर्गर ब्रांड की फ्रेंचाइजी ले ली है” – सुनने में दोनों अच्छे लगते हैं, लेकिन इनका working model, risk और profit margin बिल्कुल अलग होता है।
तो आइये इस आर्टिकल में जानते हैं आपके लिए क्या सही रहेगा Dealership या Franchise-
Franchise और Dealership
सबसे पहले Franchise और Dealership का basic concept समझते हैं।
Franchise क्या है? (What is a Franchise?)
साधारण शब्दों में कहें तो फ्रेंचाइजी में कंपनी जैसा कहती है, वैसा ही बिजनेस चलाना पड़ता है। जब आप किसी कंपनी की फ्रेंचाइजी लेते हैं, तो आप सिर्फ उनका product नहीं बेचते, बल्कि आप उनका पूरा system अपनाते हैं।
आपको दुकान का इंटीरियर वैसा ही रखना होगा जैसा कंपनी कहेगी। Staff की ड्रेस, मेन्यू, काम करने का तरीका, यहाँ तक कि कस्टमर से “नमस्ते” या “Hello” बोलने का स्टाइल भी ब्रांड decide करता है।
उदाहरण: Domino’s Pizza या KFC। अगर आप दिल्ली के Domino’s में जाएं या मुंबई के, आपको पिज्जा का स्वाद, दुकान का लुक और सर्विस एक जैसी मिलेगी। यह फ्रेंचाइजी मॉडल है। यहाँ control कंपनी के पास ज्यादा होता है।
Dealership क्या है? (What is a Dealership?)
डीलरशिप का मतलब है – किसी कंपनी का authorized seller बनना। यहाँ कंपनी का main focus सिर्फ इस बात पर होता है कि आप उनका product कितना बेच रहे हैं। आप अपनी दुकान कैसे चलाते हैं, staff को क्या पहनाते हैं या लोकल मार्केटिंग कैसे करते हैं, इसमें कंपनी बहुत ज्यादा दखल नहीं देती।
डीलरशिप में आपको एक product मिलता है, और उसे बेचने की जिम्मेदारी आपकी होती है। आपको अपने इलाके (territory) में उस product को distribute और sell करना होता है।
उदाहरण: कार या बाइक का शोरूम (Maruti Suzuki या Honda), या फिर सीमेंट और पेंट की दुकान। यहाँ आप कंपनी का बोर्ड जरूर लगाते हैं, लेकिन बिजनेस चलाने का तरीका काफी हद तक आपका अपना होता है।
Franchise vs Dealership: मुख्य अंतर (Key Differences)
अब थोड़ा गहराई में चलते हैं। एक businessman के नजरिए से इन दोनों में क्या फर्क है?
अब हम इनके बारे में थोड़ा विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं, बिजनेसमैन के नजरिये से दोनो में क्या अंतर है-
1. Business Model और Control
फ्रेंचाइजी में सबसे बड़ी चीज है – Standardization। कंपनी चाहती है कि कस्टमर को हर जगह same experience मिले। इसलिए, फ्रेंचाइजी मॉडल में आप अपनी मर्जी से ज्यादा बदलाव नहीं कर सकते। अगर आप किसी बर्गर चेन की फ्रेंचाइजी चलाते हैं और आपको लगता है कि आपके शहर में लोग समोसा पसंद करेंगे, तो भी आप अपनी मर्जी से मेन्यू में समोसा add नहीं कर सकते। आपको कंपनी की permission लेनी होगी, जो शायद ही मिले।
वहीँ डीलरशिप में आपको थोड़ी Flexibility मिलती है। मान लीजिए आप एक इलेक्ट्रॉनिक कंपनी के डीलर हैं। आप अपनी दुकान में उस कंपनी के AC के साथ-साथ किसी और ब्रांड का कूलर भी रख सकते हैं (अगर एग्रीमेंट allow करे)। आप अपने कस्टमर को डिस्काउंट दे सकते हैं, उधारी (credit) पर माल दे सकते हैं, और local level पर अपने हिसाब से बिजनेस चला सकते हैं।
Note: फ्रेंचाइजी में आप “System Follower” होते हैं और डीलरशिप में आप खुद सिस्टम बनाते हैं।
2. Investment का तरीका
Investment दोनों में लगता है, लेकिन उसका structure अलग होता है।
Franchise में:
- आपको एक Franchise Fee देनी पड़ती है जो non-refundable होती है। यह सिर्फ ब्रांड का नाम use करने की फीस है।
- Setup cost बहुत specific होता है। इंटीरियर, मशीनरी और फर्नीचर वही लेना होगा जो ब्रांड approve करेगा। अक्सर यह सामान महंगा होता है क्योंकि यह standardized वेंडर्स से आता है।
- आपको हर महीने अपनी सेल का कुछ हिस्सा (Royalty) कंपनी को देना पड़ता है। चाहे आपको प्रॉफिट हो या न हो, रॉयल्टी देनी ही पड़ेगी।
Dealership में:
- आमतौर पर कोई भारी-भरकम “Dealership Fee” नहीं होती। कुछ कंपनियां Security Deposit लेती हैं जो बाद में वापस (refundable) मिल सकता है।
- आपका मुख्य खर्चा Stock (माल) खरीदने में होता है। कंपनी कहती है कि “भैया, 10 लाख का माल उठा लो, और बेचना शुरू करो।”
- यहाँ कोई Monthly Royalty नहीं होती। आपने माल खरीदा, अपना margin जोड़ा और बेचा। जो बचा, वो आपका प्रॉफिट।
3. Training और Support
यह एक ऐसा point है जहाँ नए लोग अक्सर कंफ्यूज होते हैं।
Franchise मॉडल में कंपनी आपको Hand-holding support देती है। वो आपको बताएंगे कि मशीन कैसे चलानी है, सॉफ्टवेयर कैसे यूज करना है, और staff को कैसे train करना है। कई बार तो कंपनी खुद staff hire करके देती है। अगर आप बिजनेस में बिल्कुल नए हैं, तो फ्रेंचाइजी का यह सपोर्ट सिस्टम बहुत काम आता है।
डीलरशिप में सपोर्ट थोड़ा अलग होता है। कंपनी आपको product की training देगी (जैसे कि कार के फीचर्स क्या हैं या पेंट को कैसे mix करना है), लेकिन वो आपको यह नहीं सिखाएंगे कि “दुकान कैसे चलानी है” या “अकाउंट्स कैसे मेंटेन करने हैं”। Dealership में कंपनी मानकर चलती है कि आप पहले से एक व्यापारी हैं और आपको धंधा करना आता है।
अलग-अलग Industries में फर्क (Practical Scenarios)
सिर्फ थ्योरी से बात समझ नहीं आती। आइए अलग-अलग सेक्टर में देखते हैं कि यह गेम कैसे चलता है।
Food & Beverage (F&B) Sector
फूड इंडस्ट्री में 90% मॉडल फ्रेंचाइजी पर चलते हैं। McDonald’s, Burger King, Chai Sutta Bar – ये सब फ्रेंचाइजी हैं।
- क्यों? क्योंकि खाने में स्वाद (Taste) सबसे जरूरी है। कंपनी रिस्क नहीं ले सकती कि एक दुकान पर चाय अच्छी मिले और दूसरी पर खराब। इसलिए वो रेसिपी और ingredients पर पूरा कंट्रोल रखते हैं।
- फायदा: आपको बना-बनाया कस्टमर बेस मिलता है। लोग ब्रांड देखकर आते हैं।
- नुकसान: मार्जिन कम हो सकता है क्योंकि raw material आपको कंपनी से ही खरीदना पड़ता है, जो ओपन मार्केट से महंगा हो सकता है।
Automobile Sector
ऑटोमोबाइल में डीलरशिप मॉडल चलता है।
- क्यों? क्योंकि गाड़ी बेचना एक हाई-वैल्यू ट्रांजेक्शन है। यहाँ “सर्विस” और “सेल्समैनशिप” की जरूरत होती है। डीलर को अपना स्टॉक मेंटेन करना होता है।
- फायदा: एक बार सेटअप हो गया, तो सर्विसिंग और स्पेयर पार्ट्स से भी अच्छी कमाई होती है।
- नुकसान: इन्वेंट्री का बोझ। अगर गाड़ियां नहीं बिकीं, तो आपका करोड़ों का पैसा स्टॉक में फंस सकता है। जिसे हम “Dead Stock” कहते हैं।
Retail & FMCG
कपड़े, जूते, या किराना आइटम में दोनों मिक्स चलते हैं। लेकिन डीलरशिप (या डिस्ट्रीब्यूटरशिप) ज्यादा कॉमन है।
- जैसे Unilever या P&G का डिस्ट्रीब्यूटर बनना। यहाँ आपको वॉल्यूम पर खेलना होता है। मार्जिन कम होता है (2% से 5%), लेकिन टर्नओवर बहुत तेज होता है।
- कुछ कपड़ों के ब्रांड्स (जैसे Raymond या Fabindia) फ्रेंचाइजी मॉडल पर भी काम करते हैं, जहाँ वो दुकान का लुक और फील कंट्रोल करते हैं।

Profit और Risk का सच (The Money Talk)
आखिर में हिसाब-किताब पैसे पर ही आकर टिकता है, चाहे बात कितनी भी घुमा लें। तो चलिए पैसों की गणित समझते हैं।
Profit Margins
- Franchise: यहाँ प्रॉफिट मार्जिन आमतौर पर fix होता है या परसेंटेज में तय होता है। लेकिन याद रखें, इसमें से आपको Royalty (4% से 10%) और Marketing Fee (1% से 2%) भी देनी पड़ सकती है। तो नेट प्रॉफिट थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन sales volume ज्यादा होने से कमाई ठीक हो जाती है।
- Dealership: यहाँ आप प्रोडक्ट को wholesale रेट पर खरीदते हैं और retail प्राइस (MRP) पर बेचते हैं। बीच का अंतर आपका Gross Profit है। कई बार कंपनियां साल के अंत में “Target Completion Bonus” देती हैं, जो डीलर्स की असली कमाई होती है।
Hidden Costs (छिपे हुए खर्चे)
अक्सर लोग बिजनेस प्लान के कागजों में इन खर्चों को नहीं देखते, और बाद में पछताते हैं।
Franchise के छिपे खर्चे:
- Renovation: हर 3-4 साल में कंपनी कहेगी कि दुकान का इंटीरियर पुराना हो गया है, इसे बदलो। यह खर्चा आपको करना पड़ेगा।
- Software Fees: बिलिंग सॉफ्टवेयर का सालाना चार्ज।
- Audit Fees: कंपनी के लोग चेक करने आएंगे, उसका खर्चा भी कई बार इनडायरेक्टली आपसे लिया जाता है।
Dealership के छिपे खर्चे:
- Unsold Inventory: अगर कंपनी ने नया मॉडल निकाल दिया, तो पुराना मॉडल आपको डिस्काउंट पर (घाटा सहकर) बेचना पड़ सकता है।
- Staffing: अच्छे सेल्समैन को रोके रखना आपकी जिम्मेदारी है, कंपनी इसमें मदद नहीं करेगी।
- Local Marketing: अपने शहर में होर्डिंग लगाने का खर्चा अक्सर डीलर को खुद उठाना पड़ता है।
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Marketing कौन करता है?
मार्केटिंग बिजनेस की रीढ़ की हड्डी है।
Franchise में:
National level की मार्केटिंग ब्रांड खुद करता है। टीवी पर एड, सोशल मीडिया कैम्पेन – यह सब हेड ऑफिस देखता है। इसका फायदा यह है कि कस्टमर के दिमाग में ब्रांड पहले से बैठा होता है। आपको बस दुकान खोलनी है, कस्टमर खुद चलकर आएगा। लेकिन इसके बदले कंपनी आपसे “Marketing Fee” चार्ज करती है।
Dealership में:
कंपनी नेशनल लेवल पर ब्रांडिंग करती है (जैसे टीवी पर कार का एड), लेकिन लोकल लेवल पर कस्टमर लाना आपकी जिम्मेदारी है। अखबार में पम्प्लेट डलवाना, लोकल मेले में स्टॉल लगाना, या शहर के चौराहे पर बैनर लगाना – यह सब डीलर को खुद प्लान करना और खर्च करना होता है।
किसे क्या चुनना चाहिए? (Selection Guide)
असली सवाल यही है कि इनमें से कौन सा मॉडल आपके स्वभाव और जेब, दोनों को सूट करेगा।
यह पूरी तरह आपकी पर्सनालिटी और जेब पर निर्भर करता है।
Franchise तब चुनें जब:
- आप बिजनेस में नए हैं: अगर आपको बिजनेस का कोई अनुभव नहीं है, तो फ्रेंचाइजी का सपोर्ट सिस्टम आपके लिए बेस्ट है।
- अगर आप रिस्क कम लेना चाहते हैं: एक established ब्रांड के फेल होने के चांस, एक नई दुकान के मुकाबले कम होते हैं।
- आप सिस्टम फॉलो करना पसंद करते हैं: अगर आपको बना-बनाया रास्ता चाहिए और आप ज्यादा एक्सपेरिमेंट नहीं करना चाहते।
- आपके पास निवेश (Investment) ठीक-ठाक है: फ्रेंचाइजी फीस और सेटअप कॉस्ट देने की क्षमता है।
Dealership तब चुनें जब:
- आप अनुभवी व्यापारी हैं: आपको पता है कि माल कैसे बेचना है और कस्टमर से कैसे बात करनी है।
- आपको आजादी चाहिए: आप नहीं चाहते कि कोई रोज आपको बताए कि दुकान कैसे चलानी है।
- आप B2B (Business to Business) में अच्छे हैं: कई डीलरशिप में आपको दूसरे दुकानदारों को माल सप्लाई करना होता है।
- आप Long-term गेम खेलना चाहते हैं: डीलरशिप में शुरुआत में मेहनत ज्यादा है, लेकिन एक बार नेटवर्क बन गया तो यह पीढ़ियों तक चलने वाला बिजनेस बन सकता है।
रिस्क फैक्टर्स: क्या गलत हो सकता है?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। अच्छी बातें बहुत हो गईं, अब जरा रिस्क पर नजर डालते हैं।
Franchise के खतरे
- ब्रांड की बदनामी: अगर किसी और शहर में उस ब्रांड की फ्रेंचाइजी में कुछ गलत हुआ (जैसे खाने में कीड़ा निकलना), तो उसका असर आपकी दुकान पर भी पड़ेगा। ब्रांड की इमेज खराब, तो आपका धंधा खराब।
- Contract Renewal: मान लीजिए आपने 5 साल बहुत मेहनत की और बिजनेस जमा दिया। 5 साल बाद कंपनी ने एग्रीमेंट रिन्यू करने से मना कर दिया या शर्तें बहुत कड़ी कर दीं। आप कुछ नहीं कर पाएंगे। आपकी सारी मेहनत ब्रांड के नाम रह जाएगी।
Dealership के खतरे
- Competition: कंपनी अक्सर एक ही शहर में कई डीलर बना देती है। अगर आपके पड़ोस में ही उसी कंपनी का दूसरा डीलर खुल गया, तो आपका प्रॉफिट कट जाएगा। इसे “Territory Conflict” कहते हैं।
- Pressure: कंपनियां अक्सर माल थोप देती हैं (Dumping)। अगर आपका पिछला स्टॉक बिका भी नहीं है, तो भी कंपनी कहेगी कि नया टारगेट पूरा करने के लिए और माल उठाओ, वरना डीलरशिप कैंसिल हो सकती है।

Comparison Table (तुलना चार्ट)
नीचे दी गई टेबल से आप एक नजर में दोनों का अंतर समझ सकते हैं:
| फ़ीचर (Feature) | Franchise (फ्रेंचाइजी) | Dealership (डीलरशिप) |
| मालिकाना हक (Ownership) | आप मालिक हैं, लेकिन नियम कंपनी के चलते हैं | आप ज्यादा स्वतंत्र (Independent) मालिक हैं |
| Investment | Franchise Fee + Setup Cost + Stock | मुख्य रूप से Stock + Infrastructure |
| Profit Income | Royalty कटने के बाद बचा हुआ प्रॉफिट | सीधा Margin (Sale Price – Buy Price) |
| Training | पूरी ट्रेनिंग (Staff, Ops, Tech) मिलती है | सिर्फ प्रोडक्ट की ट्रेनिंग मिलती है |
| Marketing | ब्रांड करता है (National Level) | आपको खुद करनी पड़ती है (Local Level) |
| Risk | कम (क्योंकि ब्रांड जाना-माना है) | मध्यम (आपकी सेल्स स्किल पर निर्भर) |
| Flexibility | बहुत कम (Strict Rules) | काफी ज्यादा (Flexible) |
| Example | Domino’s, Lakme Salon, KFC | Maruti Suzuki, Cement Store, Electronics |
2024-25 के लिए प्रैक्टिकल टिप्स
अगर आप अभी कोई बिजनेस शुरू करने का सोच रहे हैं, तो मार्केट का ट्रेंड थोड़ा बदल रहा है।
- FOCO Model को समझें: आजकल फ्रेंचाइजी में FOCO (Franchise Owned Company Operated) मॉडल बहुत चल रहा है। इसमें पैसा आप लगाते हैं, लेकिन दुकान कंपनी चलाती है। यह उन लोगों के लिए अच्छा है जिनके पास पैसा है लेकिन समय नहीं।
- Electric Vehicle (EV) Dealership: डीलरशिप की दुनिया में अभी EV का बूम है। चाहे वो इलेक्ट्रिक स्कूटर हो या रिक्शा। यहाँ सरकार की सब्सिडी भी है और डिमांड भी बढ़ रही है। लेकिन ब्रांड सोच-समझकर चुनें, क्योंकि कई नई कंपनियां आ रही हैं और गायब हो रही हैं।
- Legal Agreement जरूर पढ़ें: चाहे फ्रेंचाइजी लें या डीलरशिप, एग्रीमेंट पर साइन करने से पहले किसी वकील को जरूर दिखाएं। खास तौर पर “Exit Clause” (बाहर निकलने का रास्ता) जरूर देखें। अगर धंधा नहीं चला, तो क्या आप आसानी से बंद कर पाएंगे? यह जानना बहुत जरूरी है।
निष्कर्ष (Conclusion)
“साफ शब्दों में कहें तो कोई एक मॉडल सबके लिए सही नहीं होता। यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है।
अगर आप एक investor माइंडसेट के हैं, जो चाहते हैं कि सिस्टम काम करे और आप बस मॉनिटर करें, तो Franchise आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें क्रिएटिविटी कम है, लेकिन सुरक्षा ज्यादा है।
लेकिन अगर आप एक entrepreneur (उद्यमी) माइंडसेट के हैं, जिसे खुद का साम्राज्य बनाना पसंद है, जो मोल-भाव (negotiation) करना जानता है और जिसे रिस्क लेने में डर नहीं लगता, तो Dealership का मॉडल आपको ज्यादा सुकून और पैसा दे सकता है।
जल्दबाजी न करें। जिस भी कंपनी के साथ जुड़ना चाहते हैं, उनके मौजूदा फ्रेंचाइजी या डीलर्स से जाकर मिलें। उनसे पूछें कि “भाईसाहब, असली कमाई कितनी है और दिक्कतें क्या आती हैं?” वो जो बताएंगे, वो किसी भी आर्टिकल या ब्रोशर से ज्यादा सच होगा।
क्या आप अगला कदम उठाने के लिए तैयार हैं?
क्या आप किसी specific इंडस्ट्री (जैसे फूड, कपड़ों, या ऑटोमोबाइल) की डीलरशिप या फ्रेंचाइजी के बारे में और गहराई से जानना चाहते हैं? मैं आपको उस specific इंडस्ट्री के लिए एक “Checklist” बना कर दे सकता हूँ।

